Romanchak Yatra Essay In Hindi

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'Rail Journey/ Train Journey'- A Reminiscence in Hindi | 'Rail Yatra'- Ek Sansmaran (440 Words)

'Rail Journey/ Train Journey'- A Reminiscence in Hindi | 'Rail Yatra'- Ek Sansmaran (440 Words)
रेल-यात्रा : एक संस्मरण

'रेल-यात्रा' सदैव ही अविस्मरणीय होती है। इस वर्ष ग्रीष्मावकाश में मैं भी अपने परिवार के साथ रेल-यात्रा द्वारा दिल्ली गया। जिस दिन हम सबको दिल्ली हेतु रवाना होना था, लखनऊ में घनघोर वर्षा हो रही थी। रेलवे स्टेशन तक किसी प्रकार पहुँचने पर पता चला कि ट्रेन आधा घंटे विलम्ब से जायेगी। बाहर घनघोर बारिश हो रही थी। हम सब ट्रेन की प्रतीक्षा हेतु प्रतीक्षालय पहुंचे। प्लेटफॉर्म पर हर तरफ यात्री तेज़ी से आते-जाते दिख रहे थे। बीच-बीच में फेरीवालों की आवाज़ें सुनाई दे रही थीं। ट्रेन की घोषणा जैसे ही होती थी सभी शांतिपूर्वक सुनने लगते थे।

ट्रेन आने पर हम सभी अपनी-अपनी सीट पर बैठ गए। मेरे साथ मेरे माता-पिता व दादी थीं। कुछ ही देर में ट्रेन स्टेशन से रवाना हो गई। मैं कौतुहूलवश खिड़की के पास वाली सीट पर ही बैठा था। बारिश अभी भी चल रही थी। ट्रेन चलने के बाद कुछ देर तक तो शहरी आबादी दिख रही थी। लोग रिक्शे, साइकिल, स्कूटर इत्यादि से आते-जाते दिख रहे थे एवं बारिश से बचने का प्रयास कर रहे थे। कुछ देर के पश्चात खेत-खलिहान के दृश्य दिखने लगे। हरे-भरे खेत व बाग के दृश्य मन को मोह रहे थे। जगह-जगह जल भराव के कारण तालाब-पोखर जैसी स्थिति बन गई थी। आम के बागों में वृक्षों पर आम के गुच्छे लटके दिख रह थे, जिन्हे देखकर बरबस ही मुंह में पानी आ रहा था।

ट्रेन चलती जा रही थी। बीच-बीच में छोटे स्टेशन निकलते दिख रहे थे जिनमें ट्रेन रुकती नहीं थी। बड़े स्टेशन आने पर ट्रेन रुकती थी एवं चढ़ने-उतरने वालों की भीड़ दिखने लगती थी। स्टेशन पर 'चाय-गर्म', 'पान-बीड़ी-सिगरेट', 'पूड़ी-सब्जी' एवं 'गर्म-समोसे' आदि की आवाज़ें सुनाई देने लगती थीं।

रेल-यात्रा में बाहर का दृश्य बड़ा ही मनोहारी था। कभी गांव के छोटे-छोटे घर एवं चारों ओर फल-सब्जियों के बाग दिखाई देते तो कभी खेतों के आस-पास गाय, बकरी इत्यादि के झुंड दिख जाते। आबादी भूमि से ट्रेन के गुजरने पर छोटे-छोटे बच्चे हाथ हिलाकर 'बाय -बाय' करते दिख जाते। रास्ते में छोटी-छोटी नहरें व नदियां निकलती तो पुल पर ट्रेन की गति धीमी हो जाती थी। यमुना नदी के पुल पर ट्रेन गुजरने के समय का दृश्य तो अत्यंत रोमांचित करने वाला था। गर्मी के मौसम में सैकड़ों लोग नदी में नहाते व तैरते दिखाई दे रहे थे। कुछ लोग छोटी-छोटी नावों से मछली पकड़ने का कांटा लिए बैठे थे। दिल्ली शहर यमुना नदी के किनारे बसा होने के कारण नदी के पुल से ही शहर के मकान व इमारतें दिखने लगती हैं। स्टेशन पहुँचने पर हमारे पारिवारिक मित्र हमारे स्वागत हेतु स्टेशन पर उपस्थित थे। हम लोग घर पहुंचे तथा अगले दिन से दिल्ली की ऐतिहासिक इमारतों व स्मारकों का भ्रमण किया।

यात्रा पर निबंध

यात्रा पर निबंध का रोचक वर्णन, किसी पर्वतीय स्थान का वर्णन

जीवन में कुछ ऐसे भी क्षण आते है. जिन्हें भूल पाना बड़ा कठिन हो जाता है. दूसरी बात यह की जीवन में कुछ ऐसे भी अवसर मिलते है. जो अत्यधिक रोचक और आनंददायक बन जाते है. सभी की तरह मेरे भी जीवन में कुछ ऐसे अवसर अवश्य आये है जिनकी स्मृति कर आज भी मेरा मन बाग़-बाग़ हो उठता है. उन रोचक और सरस क्षणों में एक क्षण मुझे ऐसा मिला जब मैंने जीवन में पहली बार एक पर्वतीय स्थान की सैर की. यही हम यात्रा पर निबंध के रूप में देखेंगे.




छात्रावस्था से ही मुझे प्रकृति के प्रति प्रेमाकर्षण, प्रकृति के कवियों की रचनाओ को पढने से पूर्वापेक्षा अधिक बढ़ता गया. प्रसाद, महादेवी, मुकुटधर, पाण्डेय आदि की तरह कविवर सुमित्रानंदन पंत की रचनाओं ने हमारे बचपन में अंकुरित प्रकृति के प्रति प्रेम मोह के जाल को और अधिक फैला दिया. इसमें मैं इतना फँसता गया कि मैंने यह निश्चय कर लिया कि कविवर सुमित्रानंदन पंत का पहाड़ी गाँव कौसानी एक बार अवश्य देखने जाऊँगा. अगर मंसूबे मजबूत हो तो उनके पुरे होने में कोई कसर नहीं रहती है. यह बात मुझे तब समझ में आ गई जब मैंने एक दिन कौसानी के के लिए यात्रा करने का निश्चय कर ही लिया.

 

गर्मी की छुट्टियाँ आ गई थी. स्कूल दो माह के लिए बंद हो गया था. एक दिन मैंने अपने इष्ट मित्रों से कोई रोचक यात्रा करने की बात शुरु कर दी. किसी ने कुछ और किसी ने कुछ सुझाव दिया. मैंने सबको कौसानी नामक पहाडी गाँव की सैर करने की बात इस तरह से समझा दी कि इसके लिए सभी राजी हो गए. एक सुनिश्चित दिन में हम चार मित्र कविवर पंत की जन्मस्थली कौसानी को देखने के लिए चल दिए. रेल और पैदल सफ़र करके हम लोग दिल्ली से सुबह चलकर कौसानी को पहुँच गए.

 

हम लोंगो ने देखा कि कौसानी गाँव एक मैदानी गाँव की तरह न होकर बहुत टेढ़ा-मैढा ऊपर नीचे बसा हुआ तंग गाँव है. तंग इस अर्थ में कि स्थान की कमी मैदानी गाँव की तुलना में बहुत कम है. यह बड़ी अच्छी बात रही कि हम लोगों का एक सुपरिचित और कुछ समय का सहपाठी कौसानी में ही मिल गया. अतएव उसने हम लोगों को इस पहाड़ी क्षेत्र की रोचक सैर करने में अच्छा दिशा निर्देश दिया.

 

यात्रा पर निंबध में हम लोगों ने देखा इस पर्वतीय क्षेत्र पर केवल पत्थरों का ही साम्राज्य है. लम्बे-लम्बे पेड़ों के सिर आसमान के करीब पहुँचते हुए दिखाई दे रहे थे. कहीं-कहीं लघु आकार में खेतों के कुछ फसलें थोड़ी बहुत हरीतिमा लिए हुए थी. बिना मेहनत और संरक्षण के पौधों से फूलों के रंग बिरंगे रूप मन को अधिक लुभा रहे थे. झाड़ियों की नामों निशान कम थे फिर भी पत्थरों की गोद में कहीं न कहीं कोई झाडी अवश्य दिख जाती थी जिसमें पहाड़ी जीव जंतुओं के होने का पता चलता था. उस पहाड़ी क्षेत्र में सैर के लिए बढ़ते हुए हम बहुत पतले और घुमावदार रास्ते पर ही जा रहे थे. ऐसा कोई रास्ता नहीं था जिसमे कोई चार पहिये वाला वाहन आ जा सके. बहुत दूर एक ही ऐसी सड़क दिखाई पड़ी थी.

इस पर्वतीय क्षेत्र के निवासी हम लोगों को बड़ी ही हैरानी से देख रहे थे. उनक पत्थर जैसा शरीर बलिष्ठ और चिकना दिखाई देता था. वे बहुत सभ्य और सुशील दिखाई दे रहे थे. घूमते टहलते हुए हम लोग एक बाजार में गए. वहाँ पर कुछ हम लोगों ने जलपान किया. उस जलपान की ख़ुशी यह थी कि दिल्ली और दुसरे मैदानी शहरों गाँवों की अपेक्षा सभी सामान सस्ते और साफ़ सुथरे थे. धीरे-धीरे शाम हो गई. सूरज की डूबती किरणें सभी पर्वतीय अंग को अपनी लालिमा की चादर से ढक रही थी. रात होते-होते एक गहरी चुप्पी और उदासी छा गई. सुबह उठते ही हम लोगों ने देखा कि वह सारा पर्वतीय स्थल बर्फ में कैद हो गया है. आसमान में रुई सी बर्फ उड़ रही है. सूरज की आँखे उन्हें देर तक चमका रही थी. कुछ धुप निकलने पर हम लोग वापस आ गए.

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